देहरादून: उत्तराखंड सूचना आयोग ने सूचना के अधिकार (RTI) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा है कि सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति और तबादलों से संबंधित जानकारी को निजी सूचना बताकर रोका नहीं जा सकता। आयोग ने इस संबंध में राज्य सरकार से अपनी वैधानिक स्थिति स्पष्ट करने को कहा है और संबंधित विभाग को 15 दिनों के भीतर मांगी गई सूचना उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।

RTI अपील की सुनवाई में उठा मामला
मामला सूचना आयोग में दायर एक अपील की सुनवाई के दौरान सामने आया। अपीलकर्ता संजीव चतुर्वेदी ने सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति और स्थानांतरण से जुड़ी जानकारी सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मांगी थी। हालांकि, संबंधित विभाग ने इसे ‘निजी सूचना’ बताते हुए उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया।
आयोग ने बताया विरोधाभासी रवैया
सुनवाई के दौरान सूचना आयोग ने कहा कि जब सरकार अधिकारियों की नियुक्ति और तबादलों के फैसले लेती है, तो उन्हें जनहित में लिया गया प्रशासनिक निर्णय बताया जाता है। लेकिन जब उन्हीं फैसलों से संबंधित जानकारी आरटीआई के तहत मांगी जाती है, तो उसे निजी सूचना बताकर देने से इनकार कर दिया जाता है। आयोग ने इस रवैये को परस्पर विरोधाभासी करार दिया।
पारदर्शिता प्रशासन की आधारशिला
सूचना आयोग ने अपने आदेश में कहा कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की मूल आवश्यकता है। सरकारी निर्णयों से जुड़ी सूचनाओं को केवल गोपनीयता का हवाला देकर अनावश्यक रूप से छिपाना उचित नहीं है।
आयोग ने यह भी टिप्पणी की कि प्रशासनिक अपारदर्शिता को गोपनीयता की आड़ में संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
सरकार से मांगा स्पष्ट जवाब
आयोग ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि अधिकारियों की नियुक्ति और तबादलों से जुड़ी सूचनाओं को लेकर अपनी वैधानिक स्थिति स्पष्ट करे। साथ ही संबंधित विभाग को आदेश दिया गया है कि अपीलकर्ता संजीव चतुर्वेदी को मांगी गई जानकारी 15 दिनों के भीतर उपलब्ध कराई जाए।
सूचना आयोग के इस फैसले को प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ाने और सूचना के अधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।





