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जीएसटी स्लैब के बदलने से क्या होगा सस्ता क्या होगा महंगा?

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नई दिल्ली, 4 सितम्बर – देश में वस्तु एवं सेवा कर (GST) को लागू हुए सात साल हो चुके हैं। अब सरकार इसके ढांचे को सरल बनाने और टैक्स दरों को यथासंभव तर्कसंगत बनाने पर जोर दे रही है। ताज़ा चर्चाओं में जीएसटी स्लैब में बदलाव की संभावनाओं को लेकर विचार-विमर्श तेज़ हो गया है।

मौजूदा ढांचा

इस समय जीएसटी चार प्रमुख स्लैब में लागू होता है – 5%, 12%, 18% और 28%। इसके अलावा सोना और कीमती धातुओं पर विशेष दर लागू है। विशेषज्ञ लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि कई स्लैब होने से जटिलता बढ़ती है और टैक्स चोरी की गुंजाइश भी रहती है।

प्रस्तावित बदलाव

वित्त मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार, 5% और 12% वाले स्लैब को मिलाकर एक नया ‘8% या 9%’ स्लैब बनाने पर चर्चा हो रही है। वहीं, 18% की दर को जस का तस रखने और 28% की दर केवल ‘लक्जरी और हानिकारक वस्तुओं’ पर सीमित करने का प्रस्ताव है।

एक अधिकारी ने बताया, “हमारा मकसद है कि सामान्य उपभोक्ता पर अतिरिक्त बोझ न पड़े और साथ ही टैक्स स्ट्रक्चर भी आसान बने।”

उपभोक्ताओं पर असर

अगर 5% और 12% स्लैब को मिलाकर 8% या 9% कर दिया जाता है, तो दवाइयां, पैकेज्ड फूड, रेडीमेड कपड़े और घरेलू सामान जैसे प्रोडक्ट्स की कीमतों पर सीधा असर पड़ सकता है।

  • जिन वस्तुओं पर अभी 5% टैक्स लगता है, वे थोड़ी महंगी हो सकती हैं।

  • वहीं 12% पर टैक्स लगने वाले उत्पाद कुछ सस्ते हो सकते हैं।

राज्यों की चिंताएँ

कुछ राज्यों ने आशंका जताई है कि टैक्स दरों में फेरबदल से उनके राजस्व संग्रह पर असर पड़ सकता है। खासकर पर्यटन, शराब और तंबाकू जैसे क्षेत्रों में 28% टैक्स बरकरार रखने पर वे सहमत हैं, लेकिन मझोले वर्ग की वस्तुओं के लिए वे सावधानी बरतना चाहते हैं।

विशेषज्ञों की राय

आर्थिक जानकारों का मानना है कि टैक्स दरों को घटाकर दो या तीन स्तर पर लाना सही कदम होगा।
सीए एसोसिएशन के एक सदस्य ने कहा, “कम स्लैब से न सिर्फ पारदर्शिता बढ़ेगी बल्कि कारोबारियों और उपभोक्ताओं दोनों को फायदा होगा। सबसे बड़ी राहत यह होगी कि टैक्स विवाद घटेंगे।”

1. उपभोक्ता पर असर

  • राहत:

    • रोज़मर्रा की चीज़ों (टूथपेस्ट, साबुन, शैम्पू, नूडल्स, पैक्ड फूड, छोटे इलेक्ट्रॉनिक्स) पर टैक्स घटने से इनकी कीमतें कम होंगी।

    • हेल्थ इंश्योरेंस और जीवन बीमा पर GST हटने से मध्यम वर्ग के लिए सीधा फायदा होगा।

    • आवश्यक दवाओं पर टैक्स हटने से मरीजों को राहत मिलेगी।

  • चुनौती:

    • पान मसाला, सिगरेट, शुगर ड्रिंक्स, बड़ी कारें व मोटरसाइकिलें महंगी हो जाएँगी।

    • मिडिल और अप्पर मिडिल क्लास के लोग जो लग्ज़री प्रोडक्ट इस्तेमाल करते हैं, उन्हें अधिक खर्च उठाना होगा।

 सीधा मतलब: आम आदमी के लिए रोज़मर्रा का खर्च हल्का होगा, लेकिन “लक्ज़री लाइफस्टाइल” रखने वालों को जेब से ज्यादा पैसा निकालना पड़ेगा।

2. उद्योग विश्लेषण

  • FMCG (Fast Moving Consumer Goods)

    • मार्जिन थोड़ा कम होगा लेकिन खपत (consumption) बढ़ने की संभावना है।

    • त्योहारों से पहले मांग बढ़ सकती है।

  • ऑटोमोबाइल सेक्टर

    • छोटी कार और बाइक (≤350cc) सस्ती होने से बिक्री में उछाल आ सकता है।

    • बड़ी कारों और प्रीमियम बाइक्स की मांग पर दबाव पड़ेगा।

  • हेल्थकेयर सेक्टर

    • बीमा और दवाओं पर राहत मिलने से हेल्थ सेक्टर को “पॉजिटिव बूस्ट” मिलेगा।

  • टैक्स रेवेन्यू

    • ‘सिन गुड्स’ पर 40% टैक्स सरकार को स्थायी राजस्व देगा और उपभोग को नियंत्रित करेगा।

3. राज्यों के राजस्व पर प्रभाव

  • संभावित घाटा:

    • 12% और 18% स्लैब घटाकर 5% और 18% करने से राज्यों की टैक्स कलेक्शन में शुरुआत में कमी आ सकती है।

  • संभावित फायदा:

    • खपत बढ़ने से GST कलेक्शन मिड-टर्म और लॉन्ग-टर्म में संतुलित हो जाएगा।

    • लग्ज़री और हानिकारक वस्तुओं पर 40% टैक्स से राज्यों को अतिरिक्त आय होगी।

  • राजनीतिक असर:

    • केंद्र ने राज्यों को आश्वस्त किया है कि शुरुआती घाटे की भरपाई GST मुआवजा तंत्र (compensation mechanism) से की जाएगी।

आगे की राह

जीएसटी परिषद की अगली बैठक में इस पर विस्तृत चर्चा होने की उम्मीद है। अगर राज्यों और केंद्र में सहमति बन जाती है तो आने वाले महीनों में उपभोक्ताओं को नई जीएसटी दरें देखने को मिल सकती हैं।

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