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उत्तराखंड: शहीद बलवंत सिंह खेतवाल को नम आंखों से दी अंतिम विदाई, अंतिम दर्शन के लिए उमड़ा जनसैलाब

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मणिपुर में उग्रवादियों के हमले में शहीद हुए असम राइफल्स के वारंट ऑफिसर बलवंत सिंह खेतवाल को बुधवार को पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर जब हल्द्वानी स्थित उनके आवास पहुंचा तो पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल था, जबकि पत्नी अपने पति का पार्थिव शरीर देखकर बेसुध हो गईं। बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों, जनप्रतिनिधियों और सेना के अधिकारियों ने नम आंखों से वीर जवान को श्रद्धांजलि अर्पित की।

Soldier martyred in Uttarakhand

सुबह शहीद का पार्थिव शरीर उनके मोतीनगर स्थित आवास लाया गया, जहां अंतिम दर्शन के लिए लोगों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। इसके बाद अंतिम यात्रा रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट के लिए रवाना हुई। घाट पर सैन्य सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। पूरे क्षेत्र में ‘भारत माता की जय’ और ‘बलवंत सिंह खेतवाल अमर रहें’ के नारों के बीच वीर सपूत को अंतिम विदाई दी गई।

उग्रवादियों से लोहा लेते हुए हुए थे शहीद

जानकारी के अनुसार, सोमवार को मणिपुर के उखरुल जिले में 40 असम राइफल्स के काफिले पर उग्रवादियों ने घात लगाकर हमला कर दिया। पहले आईईडी विस्फोट किया गया, जिसके बाद आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले में वारंट ऑफिसर बलवंत सिंह खेतवाल और हवलदार चंद्रमोहन सिंह ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए मातृभूमि की रक्षा में सर्वोच्च बलिदान दिया।

1991 में असम राइफल्स में हुए थे भर्ती

बलवंत सिंह खेतवाल वर्ष 1991 में असम राइफल्स में भर्ती हुए थे। तीन दशक से अधिक समय तक उन्होंने देश की सेवा की और अंतिम सांस तक अपने कर्तव्य का निर्वहन करते रहे। उनकी शहादत की खबर मिलते ही परिवार के साथ-साथ पूरे क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई।

Soldier martyred in Uttarakhand

बच्चों की पढ़ाई के लिए बस गए थे हल्द्वानी

मूल रूप से बागेश्वर जिले के तुपेड (वन डूंगरा) गांव के रहने वाले बलवंत सिंह खेतवाल ने करीब दस वर्ष पहले बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए हल्द्वानी के मोतीनगर में अपना घर बनाया था। उनकी बड़ी बेटी की शादी हो चुकी है, जबकि छोटी बेटी देहरादून में बीकॉम की पढ़ाई कर रही है। उनका बेटा हाईस्कूल का छात्र है।

पूरे क्षेत्र ने दी भावभीनी श्रद्धांजलि

शहीद के घर पर सुबह से ही लोगों का तांता लगा रहा। स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने वीर जवान को श्रद्धासुमन अर्पित किए और शोक संतप्त परिवार को ढांढस बंधाया। अंतिम यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए और पूरे सम्मान के साथ देश के वीर सपूत को अंतिम विदाई दी गई।

बलवंत सिंह खेतवाल की शहादत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि उत्तराखंड की वीरभूमि आज भी ऐसे सपूतों को जन्म देती है, जो राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने से पीछे नहीं हटते।

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