देहरादून। उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के सेलाकुई इलाके में एमबीए छात्र एजेंल चकमा की हत्या के मामले में लगातार नस्लीय टिप्पणियों और हिंसा के दावे सामने आ रहे हैं। इस बीच मुख्य आरोपी सूरज ख्वास की मां ने मीडिया में दिखाई जा रही नस्लीय भेदभाव और टिप्पणी संबंधी खबरों को पूरी तरह निराधार बताया है। उन्होंने कहा कि उनका परिवार स्वयं मणिपुर राज्य का रहने वाला है और पुलिस जांच में भी कोई नस्लीय टिप्पणी का सबूत नहीं मिला है।

एसएसपी देहरादून अजय सिंह ने जांच के बाद बताया कि यह मामला जातीय टिप्पणी के बजाय हत्या से संबंधित है। मामले में एससी-एसटी एक्ट की धाराओं को बढ़ाया गया है।
जांच में सामने आया कि बाजार में किसी बात को लेकर सूरज ख्वास के समूह और एजेंल चकमा के बीच भिड़ंत हुई। मारपीट के दौरान शौर्य राजपूत ने एजेंल चकमा के सिर पर हाथ में पहने कड़े से हमला किया, जिससे वह अस consciousness हो गए। इसी दौरान यज्ञराज अवस्थी ने पास ही अंडों की ठेली से चाकू उठाकर एजेंल की पीठ में वार किया। गंभीर रूप से घायल एजेंल को उसके भाई और परिचित अस्पताल ले गए।
घटना के संबंध में पुलिस कंट्रोल रूम या स्थानीय थाने को कोई सूचना नहीं दी गई थी। पीड़ित स्वयं ही अस्पताल गया और 9 दिसंबर की शाम 6:48 बजे ग्राफिक्स एरा अस्पताल में पहुंचा। 7:02 बजे उसे इमरजेंसी में भर्ती किया गया। डॉ. राशिद ने प्रारंभिक इलाज शुरू किया, बाद में उसे क्रिटिकल यूनिट में शिफ्ट किया गया। न्यूरो सर्जन डॉ. पीयूष पांडे की देखरेख में उसका उपचार चला, लेकिन 26 दिसंबर को एजेंल चकमा की मौत हो गई।
एजेंल के परिजनों ने आरोपियों के लिए कड़ी सजा की मांग की है। मामा मोमेन चकमा ने कहा कि परिवार चाहता है कि सभी आरोपियों को मौत की सजा या कम से कम आजीवन कारावास मिले। उन्होंने बताया कि एजेंल ने बार-बार कहा था कि वह एक भारतीय है, लेकिन हमलावरों ने बेरहमी से उसकी पीठ में दो बार चाकू मारा और गर्दन में गंभीर चोट पहुंचाई।
परिवार ने सरकार से अपील की है कि ऐसे कदम उठाए जाएं जिससे पूर्वोत्तर के लोग नस्लीय घृणा और भेदभाव का सामना न करें। वहीं, परिवार ने देहरादून पुलिस के नस्लीय हिंसा के दावे को खारिज करने पर भी सवाल उठाए हैं।





