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अपने दोनों गीतों पर खूब तालियां और वाहवाही बटोरी-कामनाओं ने भरा खुद माॅंग में सिंदूरवासना के सामने अरमान चकनाचूरलुट गया सम्मान जिसका हो गया कंगालआस्थाऍं हाथ अपने धो गईं। अपनेपन का नाटक करने वालों काकच्चा चिट्ठा कौन भला अब खोलेगामानवता की सेवा में चतुराई सेकाला धन भी उजला होकर डोलेगा। वरिष्ठ पत्रकार-कवि गणेश 'पथिक' ने श्रीराम स्तुति, वाणी वन्दना छन्द और यह अतुकांत कविता सुनाकर वाहवाही बटोरी-हम नहीं हैं वोकुरु कुल गुरु द्रोण-भूखे बच्चे के क्रंदन से सहमीजिसकी महारथी जिजीविषा,धृतराष्ट्री चाकरी की गहरी धुंधमें छिपकर सो जाती है। संस्थाध्यक्ष आशु कवि रामकुमार कोली ने गोष्ठी का काव्यमय सफल संचालन करने के साथ ही भजन और गीत से भक्ति-आनंदरस की वर्षा की और खूब प्रशंसित हुए- हे राम रमा रमणम् रमणम्हे राम रमा नमनम् नमनम्।तुम गूंज रहे भवनम् भवनम्।तुम ही कण-कण में रमते हो,लंकेश का कर दहनम-दहनम्।तुम हो सुख धाम अमल चेतन,अनिकेत, अजन्म, अलख, बेतन,निर्गुण, अद्वैत से घट-घट में,कल्याण कृती जन-जन, जन-जन,श्रीराम बसे तुम मन-मन में,तुम पूजित हो सदनम्-सदनम्। मुख्य अतिथि रामकुमार भारद्वाज 'अफरोज़' ने समकालीन समाज की विद्रूपताओं पर अपनी चुटीली-मारक ग़जलों के जरिए करारी चोट की और एक सभ्य-संवेदनशील समाज में ढलने की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए खूब तालियां, वाहवाही और प्रशंसा बटोरी- आप क्या वाकिफ नहीं हैं आज के वातावरण सेबेटियां भयभीत घर में लंपटों के आचरण से?राजधानी
का प्रदूषण दे रहा संकेत यह भीदेश की संसद अभी है बेखबर पर्यावरण से।वेशभूषा की नुमाइश आजकल सत्संग में भीकिस कदर तहज़ीब बदली मॉडलिंग के अनुसरण से।इस कदर धनवान लोगों का मनोविज्ञान बदलानिर्धनों को दूर करते जा रहे अंत:करण से।कौन ऊंचा कौन नीचा कौन सेवक कौन स्वामीमुक्ति कब मिल पाएगी हिंदुत्व को इस व्याकरण से? अपनी छोटी-छोटी कविताओं से विसंगतियों पर व्यंग बाणों के अचूक प्रहार करते और सबको हर पल हंसाते रहने वाले वरिष्ठ व्यंगकार दीपक मुखर्जी 'दीप' ने भी गोष्ठी को अविस्मरणीय बनाते हुए नई रौनक बख्शी- हर रात बिकती रहीं,रोटियों के लिए बेटियांवेदनाएं,संवेदनाएंमुंह ढककर रोती रहींहोते ही भोर, संवेदनाएं स्वेत मुखौटे ओढ़ ।। युवा कवि नरेंद्र पाल ने सुंदर भजन गाया और इस खूबसूरत ग़ज़ल से किताबों की दुनिया में एक बार फिर लौट चलने की पुरजोर पैरवी की- अब तो बस यादें ही बाकी बची हैं,सुनाई नहीं देता तराना किताब का।चलो फिर से लौटा लें वो लम्हे,भर दें दिल में खजाना किताब का। वरिष्ठ ग़ज़लकारा शुभम साहित्यिक संस्था की अध्यक्षा सत्यवती सिंह 'सत्या' ने स्वास्थ्य खराब होते हुए भी सस्वर ग़ज़ल गाकर खूब तालियां बटोरीं-हम तो उस वक्त ही मर जाएंगेवो अगर सच में मुकर जाएंगे।मौत का खौफ दिखाते क्यों होहम कहां जिंदा जो मर जाएंगे?विशिष्ट अतिथि गजेंद्र सिंह ने शहरीकरण के खतरों से आगाह कराता