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पिछले 150 वर्षों से होली नहीं मनाई जाती। ग्रामीण इसे दैवीय शक्ति का प्रकोप मानते हैं और इस परंपरा का पालन पीढ़ी दर पीढ़ी कर रहे हैं। होली खेलने पर फैला था हैजा प्राप्त जानकारी के अनुसार जिला मुख्यालय से लगभग 20 किमी दूर तल्लानागपुर पट्टी के इन गांवों में करीब 372 साल पहले जम्मू-कश्मीर से कुछ पुरोहित परिवार आकर बसे थे। वे अपनी कुलदेवी मां त्रिपुरा सुंदरी की मूर्ति और पूजन सामग्री साथ लाए थे, जिन्हें गांव में स्थापित किया गया। मान्यता है कि मां त्रिपुरा सुंदरी, जो वैष्णो देवी की बहन मानी
जाती हैं, उन्हें होली का हुड़दंग और रंग पसंद नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार, लगभग 150 साल पहले जब गांव में होली खेली गई, तो हैजा की महामारी फैल गई, जिससे कई लोगों की मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद से गांव वालों ने होली न मनाने का संकल्प लिया, जो आज भी कायम है। परंपरा निभाने की मजबूरी ग्रामीणों के मुताबिक वे भी होली खेलना चाहते हैं, लेकिन अपने रीति-रिवाजों और परंपराओं को तोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। गांव की महिलाओं, सुनीता देवी और कमला देवी, के अनुसार यह परंपरा इतनी