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आने वाली अशिता के पिता इलेक्ट्रिक केबल के व्यवसाय में हैं और मां गृहिणी हैं। फैशन डिजाइन की पढ़ाई के दौरान उन्होंने देखा कि फैशन इंडस्ट्री में हर दिन भारी मात्रा में कपड़ा कचरा पैदा होता है, जो सीधे लैंडफिल में चला जाता है। इसी से उन्हें विचार आया कि क्यों न इन स्क्रैप कपड़ों को फिर से इस्तेमाल में लाया जाए। अपने स्टार्टअप के जरिए अशिता अब तक 30,000 किलो से ज्यादा कपड़ा कचरा दोबारा उपयोग कर चुकी हैं। इस पहल से 66 लाख लीटर पानी की बचत और 1 लाख किलो कार्बन उत्सर्जन की रोकथाम हुई है – वो भी बिना किसी रसायन के इस्तेमाल के। ऐसा है बिजनेस मॉडल 'पैवंद स्टूडियो' का बिजनेस मॉडल अपसाइक्लिंग और पारंपरिक भारतीय शिल्पकला के अनोखे संयोजन पर आधारित है। वे डिजाइनर्स, फैशन ब्रांड्स और एक्सपोर्ट हाउस से टेक्सटाइल वेस्ट जुटाती
हैं। फिर उसे हथकरघा बुनाई, कढ़ाई और पैचवर्क जैसी तकनीकों से नए डिजाइनर फैब्रिक में बदला जाता है। इन फैब्रिक्स की कीमत ₹1,000 से ₹4,000 प्रति मीटर तक होती है और इन्हें फैशन डिजाइनर्स, होटल्स व इंटीरियर डिजाइनर्स द्वारा खरीदा जाता है। अब तक ब्रांड 50,000 मीटर से अधिक कपड़ा बेच चुका है। यह प्रक्रिया बिना पानी और केमिकल के होती है, जिससे पर्यावरण पर नकारात्मक असर लगभग शून्य रहता है। शुरुआत में मिला परिवार से विरोध अशिता जब यह अनोखा आइडिया लेकर आईं, तब परिवार को शक था। क्योंकि वह पढ़ाई में तेज थीं, इसलिए उनसे किसी कॉर्पोरेट करियर की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन अमेरिका की लॉरेट इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी नेटवर्क से मिले एक इंटरनेशनल ग्रांट ने उनके स्टार्टअप आइडिया को मजबूती दी और परिवार का भरोसा भी जीता। शुरुआत में बुनकरों और डिजाइनरों को टेक्सटाइल