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बुधवार
14 जून 2026 National Edition |
उत्तराखंड के मैदानी इलाकों में किच्छा की पहचान लंबे समय तक एक पारंपरिक कृषि प्रधान क्षेत्र की रही। लेकिन पिछले एक दशक, विशेषकर 2012 से 2022 के बीच, यहाँ के विकास की दिशा में एक बुनियादी बदलाव महसूस किया गया। यह वह दौर था जब किच्छा ने 'लोकल' राजनीति से ऊपर उठकर 'स्टेट और नेशनल' स्तर के प्रोजेक्ट्स में अपनी जगह बनानी शुरू की। पूर्व विधायक राजेश शुक्ला के कार्यकाल के दौरान जिस तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर और औद्योगिक गलियारों की नींव रखी गई, वह केवल तात्कालिक सुधार नहीं थे, बल्कि किच्छा को अगले 20-30 वर्षों के लिए तैयार करने की एक कोशिश नजर आती है। जब विकास की बात 'गली-मोहल्ले की नाली' से ऊपर उठकर 'स्मार्ट सिटी और एम्स' तक पहुँचती है, तो जनता के मन में नेतृत्व की एक अलग छवि स्वतः ही बनने लगती है। इंफ्रास्ट्रक्चर: सिर्फ सड़कें नहीं, आर्थिक धमनियों का निर्माण किच्छा के भौगोलिक महत्व को समझते हुए राजेश शुक्ला ने...
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स्वास्थ्य और शिक्षा: विजनरी बदलाव का प्रयास अक्सर छोटे क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर केवल दवाइयों की उपलब्धता पर चर्चा होती है, लेकिन किच्छा में यह विमर्श 'एम्स' तक पहुँचा। स्वास्थ्य का नया मॉडल: 2017 के दौर में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) को लेकर हुई आलोचनाओं को राजेश शुक्ला ने एक बड़ी चुनौती के रूप में लिया। परिणाम स्वरूप, किच्छा में 100 एकड़ में ₹700 करोड़ की लागत से बनने वाला एम्स (AIIMS) सैटेलाइट अस्पताल स्वीकृत हुआ। यह कदम बताता है कि वे केवल छोटी खामियों को ठीक करने के बजाय एक ऐसा सिस्टम खड़ा करना चाहते थे जिससे आने वाली पीढ़ियों को इलाज के लिए दिल्ली या ऋषिकेश न भागना पड़े। शिक्षा का विकेंद्रीकरण: मॉडल डिग्री कॉलेज की स्थापना और उसके लिए भूमि आवंटन का उद्देश्य यही था कि किच्छा का युवा