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दृष्टिकोण से प्रेरित नहीं हैं।” “जब तक दोनों तरफ विश्वास नहीं होगा, संघर्ष ख़त्म नहीं होगा। पहले यह स्वीकार करना ज़रूरी है कि हम सब एक हैं।” मुस्लिम समाज की प्रतिक्रिया उनके इस बयान का स्वागत कई मुस्लिम नेताओं ने किया। महाराष्ट्र अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष प्यारे खान ने कहा, “यह बयान स्पष्ट करता है कि भारत की एकता और अखंडता को कोई नहीं तोड़ सकता।” अजमेर दरगाह के दीवान सैयद नसीरुद्दीन चिश्ती ने कहा, “यह सामाजिक सौहार्द और भाईचारे को मज़बूत करने की दिशा में अहम कदम है।” हालाँकि कुछ आलोचक यह भी कहते हैं कि संघ के विचार और ज़मीनी राजनीति में फर्क दिखाई देता है। 1. धार्मिक असर भागवत के इस बयान से मुस्लिम समाज में यह संदेश गया कि आरएसएस का शीर्ष नेतृत्व इस्लाम को भारत के ताने-बाने का हिस्सा मानता है। यह बयान धार्मिक असुरक्षा की भावना को कम कर सकता है, खासकर उन
लोगों में जो मानते हैं कि उनकी पहचान पर लगातार सवाल उठाए जाते हैं। धार्मिक विद्वानों का मानना है कि अगर ऐसे विचार लगातार और व्यवहारिक रूप से सामने आते हैं तो इससे हिंदू-मुस्लिम संवाद और विश्वास बहाली की दिशा में बड़ा असर पड़ेगा। यह भी संकेत मिलता है कि हिंदू दर्शन और भारतीय संस्कृति बहु-धार्मिक और समावेशी है। 2. राजनीतिक असर राजनीतिक दृष्टि से यह बयान कई मायनों में अहम है। चुनावी साल में इसे बीजेपी और आरएसएस की नरम छवि दिखाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि यह वक्तव्य उन इलाक़ों और वर्गों को संदेश देने की कोशिश है जहाँ धार्मिक ध्रुवीकरण की आलोचना बढ़ रही है। इससे यह भी संकेत जाता है कि संघ अपने 100 साल पूरे होने के अवसर पर समावेशी और राष्ट्रवादी छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेश करना चाहता है। 3. विपक्ष की