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(गुप्तकाशी) में आयोजित होगा। मेले की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। इस मेले की शुरुआत चैत माह की 20 प्रविष्ट से होती है, जब बीज वापन मुहूर्त के साथ इसकी योजना तय की जाती है। लेकिन इसका मुख्य आयोजन बैसाखी के अगले दिन होता है। तीन गांवों—देवशाल, कोठेडा और नारायणकोटी—में मेले से तीन दिन पहले से परंपरागत "लॉकडाउन" लागू हो गया है। इस दौरान बाहरी लोगों और रिश्तेदारों का गांव में प्रवेश वर्जित होता है, ताकि परंपरा की शुद्धता बनी रहे। जाखराज मेले की खास बात है यहां बनने वाला भव्य अग्निकुंड, जिसे करीब 50 क्विंटल लकड़ियों से तैयार
किया जाता है। लकड़ियों में खासतौर पर बांज और पैंया वृक्ष का प्रयोग होता है। यह अग्निकुंड 14 अप्रैल की रात को पारंपरिक पूजा के बाद प्रज्वलित किया जाएगा। रातभर जलने वाले इस अग्निकुंड की रक्षा नारायणकोटी और कोठेडा के ग्रामीण करते हैं। अग्नि से तैयार दहकते अंगारों के बीच 15 अप्रैल को जाख देवता नृत्य करेंगे और श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देंगे। जाखराज की मूर्ति देवशाल के विंध्यवासिनी मंदिर से विशेष कंडी में ढोल-नगाड़ों के साथ जाखधार लाई जाती है, और पूजा-अर्चना के बाद वापस मंदिर में स्थापित की जाती है। जाख राजा के पश्वा, जो इस बार