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तो एक दिन वह आपके नियंत्रण में हो ही जाएगा। आचार्यश्री ने कथा पंडाल में उपस्थित महिला-पुरुष श्रद्धालुओं को रुक्मिणी हरण प्रसंग सुनाते हुए समझाया कि अपने भक्तों की पुकार पर भगवान बिना देर किए दौड़े चले आते हैं। एक बार कोई सच्चे मन से प्रभु को रुक्मिणी, प्रह्लाद, शबरी जैसे भक्तों की तरह पुकारकर तो देखे। बताया-रुक्मिणी की मां ने बेटी के कल्याण की कामना से द्वारिकाधीश को रो-रोकर पुकारा-हमारी नइया को खेने वाले जो खे चलो तो हम भी जानें।यहीं से केशव जो तुम हमारे बने चलो तो हम भी जानें।और, रुक्मिणी ने भी ब्राह्मण के हाथों द्वारिकापुरी में श्रीकृष्ण को भाव भरा संदेश भेजकर वरण करने की कातर प्रार्थना की-यदि नाथ न आए तो याद रहे प्रभु की प्रभुता पर धूरि
फिरेगी।और, विलंब होने पर रुक्मिणी प्रभु को याद कर-करके बिलखती हैं-आए न श्याम सुध लेन हमारी। समझाया-बहू के सामने उसके मायके वालों की बुराई कभी भी नहीं करनी चाहिए। बलदाऊ भइया के समझाने पर श्रीकृष्ण ने रुक्मि के केश काटकर उसे प्राण दान दे दिया और रुक्मिणी को द्वारिकापुरी में लाकर उनसे विधि विधान से विवाह किया। स्यमंतक मणि, शत्राजित, जामवंत से घोर युद्ध और जामवंती, सत्यभामा से विवाह के प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए आचार्य अवध किशोर शास्त्री ने श्रद्धालुओं को चेताया कि सच्चे भक्त भगवान को कभी पकड़ते नहीं हैं बल्कि भगवान ही उन्हें पकड़ लेते हैं और जब भगवान एक बार अपने भक्त को पकड़ लें तो कभी उसे छोड़ते नहीं हैं। सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए समझाया-भाई का अंश