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उत्तराखंड के इन गांवों में गहनों पर पाबंदी! महिलाएं नहीं पहन सकतीं तीन से ज्यादा ज्वैलरी, जानिए वजह

मुख्य समाचार: विकासनगर (उत्तराखंड): देवभूमि उत्तराखंड अपने पारंपरिक परिधान और आभूषणों के लिए प्रसिद्ध है।
इसी सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हुए देहरादून जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र के दो गांव—कंदाड और इंद्रोली—ने एक ऐतिहासिक सामाजिक निर्णय लिया है।
किच्छा (एजेंसी)। विकासनगर (उत्तराखंड): देवभूमि उत्तराखंड अपने पारंपरिक परिधान और आभूषणों के लिए प्रसिद्ध है। इसी सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हुए देहरादून जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र के दो गांव—कंदाड और इंद्रोली—ने एक ऐतिहासिक सामाजिक निर्णय लिया है। ग्राम पंचायत कंदाड की बैठक में सर्वसम्मति से तय किया गया कि अब गांव की महिलाएं शादी-विवाह और मांगलिक अवसरों पर केवल तीन सोने के आभूषण — कान के झुमके, नाक की लौंग (फूली) और
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गले का मंगलसूत्र — ही पहनेंगी। निर्णय का उल्लंघन करने पर 50,000 रुपये का जुर्माना भी तय किया गया है। यह फैसला गांव में दिखावे की प्रवृत्ति को रोकने और आर्थिक असमानता को कम करने के उद्देश्य से लिया गया है। ग्राम प्रधान अरविंद चौहान ने बताया कि, “कंदाड और इंद्रोली के ग्रामीणों ने मिलकर यह फैसला लिया है, जो समाज में समानता और सादगी का संदेश देता है। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणादायक कदम है।” महिलाओं
ने भी इस निर्णय का स्वागत किया। स्थानीय महिला फूल्पा देवी ने कहा कि, “गांव का फैसला सभी के लिए उचित है। इससे अनावश्यक दिखावा बंद होगा और सब एक समान दिखेंगे।” वहीं, अमृता चौहान ने कहा कि पहले कुछ महिलाएं अत्यधिक गहने पहनती थीं जिससे गरीब परिवारों पर दबाव बढ़ता था। स्थानीय ग्रामीण अंकित चौहान ने बताया कि सोने के आभूषणों की बढ़ती कीमतों ने सामाजिक असमानता को जन्म दिया था। कुछ परिवार कर्ज लेकर भी गहने बनवाते
थे, जो आर्थिक रूप से नुकसानदायक था। वहीं, बलदेव सिंह ने कहा कि यह निर्णय अमीरी-गरीबी का भेद मिटाने में मदद करेगा। 90 वर्षीय बुजुर्ग उमा देवी ने इस फैसले को सराहनीय बताया। उन्होंने कहा, “पहले के समय में महिलाएं सादगी से जीवन जीती थीं। यह निर्णय हमारी पुरानी परंपरा को फिर से जीवित करेगा।” कुल मिलाकर, जौनसार-बावर क्षेत्र के इन दो गांवों का यह कदम न सिर्फ सामाजिक समानता की दिशा में एक मिसाल है, बल्कि परंपरा और सादगी की ओर लौटने का भी प्रतीक बन गया है।

📌 मुख्य बिंदु / समाचार सारांश

  • ” कुल मिलाकर, जौनसार-बावर क्षेत्र के इन दो गांवों का यह कदम न सिर्फ सामाजिक समानता की दिशा में एक मिसाल है, बल्कि परंपरा और सादगी की ओर लौटने का भी प्रतीक बन गया है।
  • यह निर्णय हमारी पुरानी परंपरा को फिर से जीवित करेगा।
  • उन्होंने कहा, “पहले के समय में महिलाएं सादगी से जीवन जीती थीं।