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रस के मुक्तक और गीत से वाहवाही बटोरी- ऐसी चपल दामिनी दमकी शीशे का घर टूट गया। कहते हैँ उसके हाथों में आकर साहिल छूट गया। ये लगता है नदी किनारे फिर से रांझा छला गया। कब तक वह परदेशी रहता आखिर इक दिन चला गया। संस्था की संरक्षक चर्चित कहानीकार डॉ. निर्मला सिंह ने अपने इस गीत को सस्वर सुनाकर खूब वाहवाही बटोरी- संयोग वियोग मिले हैँ कांटों में फूल खिले हैँ। यह अजब योग देखा है जो बिछड़े वही मिले हैँ। संस्थाध्यक्ष दीप्ती पांडे 'नूतन' ने अपनी कविता कुछ ऐसे पढ़ी,,,चलो आज झूठी मुस्कानों को छोड़ रोया जाये। क्यों न किसी अज़नबी के घाव को धोया जाये। अधिक पाने की चाह ने कर दिया सबको
अकेला, क्यों न इस दर्दे ग़म को दूर किया जाये। जिसने सभी की वाह वाही लूटी। उपाध्यक्ष अल्पना नारायण ने अपनी ग़ज़ल पढ़ते हुए कहा कि,,किस पर भरोसा करे कौन कैसे सभी लोग दिखते मुखौटा लगाये। ने वातावरण को भावुक बना दिया। महासचिव किरण कैंथवाल की रचना-सवालों के घेरों में तुझको रोज पाती हूँ। मची कैसी हलचल है तेरे औऱ मेंरे दिल में, यही सब सोचकर मैं तो ख़ुद ब ख़ुद डूब जाती हूँ। सभी को अच्छी लगी। इन्द्रदेव त्रिवेदी के इस गीत पर भी खूब तालियां बजीं- अगर आप यूँ मुस्कराते रहेंगे। तो सच मानिये हम गाते रहेंगे। नहीँ जिन्दा रहना युगों से युगों तक, परों के घरौंदे बनाते रहेंगे।मोना प्रधान की कविता- चंद सांसों का खेल