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मुक्ति, दानवीर बलि और भगवान वामन तथा दानवीर कर्ण के प्रेरणादायी प्रसंगों का वर्णन करते हुए आचार्य अवध किशोर ने महिला-पुरुष भक्तजनों को समझाया कि गजेंद्र की पुकार पर नारायण विष्णु ने सुदर्शन चक्र को भेजकर गजेंद्र के साथ ही ग्राह का भी उद्धार किया। श्रीविष्णुु ने गजेंद्र को अपने धाम ले जाने के लिए अपने साथ विमान पर बैठाया जबकि दूसरे वाहन पर ग्राह को बैठाकर गजेंद्र से भी पहले वैकुंठ धाम पहुंचवा दिया। गजेंद्र की आशंका का निवारण करते हुए श्री विष्णु ने उसे समझाया कि मेरे भक्त के चरणों को जो पकड़ लेता है, उसका उद्धार तो भक्त से भी पहले होना सुनिश्चित ही हो जाता है। दानवीर बलि की पावन कथा सुनाते हुए बताया कि सच्चे मन और पूरी श्रद्धा से 100 यज्ञ करने वाला याजक निश्चित ही इंद्रासन का अधिकारी हो जाता है। उपस्थित श्रद्धालुगण दैत्यराज दानवीर बलि याचकों को सर्वस्व दान के संकल्प के साथ जब 99 यज्ञ सफलतापूर्वक पूर्ण कर लेते हैं तो देवराज इंद्र
की प्रार्थना पर भगवान विष्णु वामनावतार लेकर बलि के समक्ष ब्राह्मण रूप में प्रकट होते हैं और उनसे तीन पग भूमिदान का संकल्प करवाकर एक पग में ब्रह्म लोक, दूसरे पग में पृथ्वी समेत तीनों लोक नाप लेते हैं। बलि की प्रार्थना पर भगवान विष्णु तीसरा चरण उसके सिर पर रखकर उसे अपने परम भक्त का पद प्रदान कर सदैव के लिए उसके हो जाते हैं। आचार्य श्री अवध किशोर ने दान की महत्ता बताते हुए कहा कि कर्ण ने अपने प्राणों की चिंता किए बगैर न सिर्फ पांच दैवीय अचूक बाण, अपना अमोघ कवच-कु़ंडल और मरणासन्न स्थिति में भी स्वर्ण मंडित दांत भी तोड़कर दान करने में तनिक भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। उसी का परिणाम यह हुआ कि भगवान कृष्ण ने अपनी हथेली पर अपने परम प्रिय और दानवीर भक्त कर्ण का अपने हाथों से अंतिम संस्कार कर अपने बैकुंठ धाम और अपने हृदय स्थल में उन्हें सर्वोच्च स्थान प्रदान किया।कथाव्यास ने समझाया कि गृहस्थ आश्रम अन्य तीनों आश्रमों- ब्रह्मचर्य,