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जब बनभूलपुरा निवासी एक मानसिक रूप से दिव्यांग युवती लापता हो गई थी। अगले दिन उसके भाई ने गुमशुदगी दर्ज कराई। 8 मार्च की रात युवती एक पेट्रोल पंप के पास मिली। परिजनों के अनुसार, उसके कपड़ों पर खून के धब्बे और शरीर पर चोट के निशान थे। हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए डीएनए साक्ष्यों की ‘चेन ऑफ कस्टडी’ सुरक्षित साबित नहीं की जा सकी। पुलिस यह सिद्ध नहीं कर पाई कि बरामद कपड़ों और नमूनों को प्रयोगशाला भेजे जाने तक सुरक्षित रखा गया था। अदालत ने स्पष्ट किया कि दस्तावेजी प्रमाण के अभाव में वैज्ञानिक रिपोर्ट को निर्णायक साक्ष्य नहीं
माना जा सकता। दूसरे आरोपी के मामले में डीएनए प्रोफाइलिंग में उसका कोई मेल नहीं मिला, जिससे उसे यौन हमले के आरोप से बाहर कर दिया गया। खंडपीठ ने कहा कि केवल संदेह या साथ देखे जाने के आधार पर किसी को दुष्कर्म जैसे गंभीर अपराध में दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अपहरण में दोषसिद्धि बरकरार हालांकि अदालत ने दूसरे आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 363 (अपहरण) के तहत दोषी माना। सीसीटीवी फुटेज में आरोपी को युवती का हाथ पकड़कर ले जाते देखा गया था। अदालत ने कहा कि युवती की मानसिक स्थिति को देखते हुए उसकी सहमति का कोई कानूनी महत्व नहीं